कहानी -लहर

Author Name – Meena Dugar, Kolkata

Categories – Story

सजा नहीं सम्मान होती है बेटियां,
गैरों के बीच अपनी होती है बेटियां।

शीला अपनी बेटी के होने वाले बच्चे के लिए स्वेटर बुन रही थी। भविष्य के सपनों को संजोते संजोते अचानक वह अतीत की उधेड़बुन में लग गई। पुरानी यादें ताजा होने लगी।

18 वर्ष की उम्र में उसका विवाह प्रेम के साथ हुआ। समय पंख लगाकर उड़ने लगा। सुख भरे दिन कैसे बीते पता ही नहीं चला। ऐसे में पिंकी का जन्म मानो सब कुछ मिल गया। गुड्डी का जन्म हुआ तो घर परिवार में खुसर पुसर होने लगी परंतु प्रेम और शीला को इनसे बेखबर अपनी दुनिया में मस्त थे। 4 साल बाद शीला ने जुड़वा बेटे -बंटी और छोटू को जन्म दिया तो घर में खुशियों की लहर दौड़ गई। माता पिता ने बच्चों की परवरिश में जी जान लगा दी। पिंकी और गुड्डी भी उनके चारों ओर घूमती तथा उनके छोटे-छोटे कामों में मां का हाथ बंटाती। वे कभी उनकी दूध की बोतल पकड़ती तो कभी झुनझुना बजाती।

अचानक एक दुर्घटना में प्रेम की मौत हो गई शीला पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। एक दो बरस तो सहानुभूति में निकल गए। फिर शुरू हुआ जिंदगी की हकीकत से सामना। घर में दूसरा कोई कमाने वाला नहीं था। ऐसी स्थिति में अपनों ने भी मुंह फेर लिया किंतु शीला ने हिम्मत नहीं हारी और घर बैठे बैठे कुछ कुछ काम करने लगी और बेटियों की पढ़ाई चालू रखी ।

सब ताने देते बेटियों को पढ़ा कर क्या होगा ‌कहां से ढूंढोगी पढ़ा लिखा लड़का। बेटियों को सिर चढ़ाना ठीक नहीं। जो भी आता सांत्वना के स्थान पर कटाक्ष करता मानो बेटी को जन्म देकर शीला ने कोई गुनाह किया हो।

समय अपनी गति से बढ़ता रहा और पिंकी पढ़ लिखकर समझदार हो गई ।मां ने शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दिए। अब वह नौकरी करने लगी और माता पिता के सपनों को पूरा करने की कोशिश करने लगी। गुड्डी भी कॉलेज में आ गई थी। मां और पिंकी ने पूरी मेहनत कर तीनों बच्चों को होशियार किया। गुड्डी की शादी की तथा बंटी और छोटू का आगे की पढ़ाई के लिए अच्छे कॉलेजों में दाखिला करवा दिया।

कुछ साल बीते, दोनों भाइयों की शादी हो गई। वह उन्नति करते गए और अलग-अलग बस गए। शुरू में मां बहन का हालचाल पूछते फोन करते । खर्चा भेजते कभी कभार आ भी जाते।

धीरे-धीरे सब बंद हो गया वे अपने अपने परिवार में मस्त हो गए। किंतु दीदी का घर बसाने की बात मन में नहीं आई। मां भी बीच बीच में कहती किंतु कोई जवाब नहीं मिलता

एक बार गुड्डी एक ऐसा रिश्ता लेकर आई जो दीदी और मां के अनुकूल था ।मां ने दोनों बेटों को फोन किए। इस बारे में बात करनी चाही किंतु वे कहने लगे इस उम्र में शादी करके दीदी क्या करेगी। उन्हें डर था कि दीदी के ससुराल जाने पर मां की जिम्मेदारी उन्हें उठानी पड़ेगी।

मां और गुड्डी ने मिलकर दीदी का रिश्ता पक्का कर दिया और बेटों को खबर कर दी आने की बात पर एक ने ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलने का बहाना किया तो दूसरों ने बच्चों की परीक्षा का।

खैर, ऐसे में गुड्डी एवं उसके पति ने मां का साथ दिया और पिंकी का विवाह सादगी पूर्ण ढंग से राहुल के साथ हो गया। शादी से पूर्व दीदी की एक ही शर्त थी कि वह अपनी मां को अपने साथ ही रखेगी। माता पिता के प्यार से वंचित राहुल ने यह बात सहर्ष स्वीकार कर ली। मां का सिर गर्व से ऊंचा था उसे लगा उसने बेटियों को पढ़ा लिखा कर कोई गलती नहीं की। उसकी बेटियां ही उसका सम्मान थी अन्यथा दुनिया की इस भीड़ में उसे सहारा देने वाला कोई न था बेटा भी नहीं।

सोचते सोचते न जाने कब उसकी आंख लग गई। दरवाजे की घंटी सुनकर उसकी आंख खुली। उसने उठकर दरवाजा खोला सामने राहुल और पिंकी खड़े थे। उनके हाथ में डॉक्टर की रिपोर्ट थी‌ वे अत्यंत प्रसन्न लग रहे थे देखते ही मां सब कुछ समझ गई।

ममता की चौखट पर खड़ी बेटी को मां ने आशीर्वाद दिया-
तुम्हारी एक प्यारी सी बेटी हो जो तुम्हारी ही परछाई हो।

  • उपासिका मीना दुगड़, कोलकाता
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